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“भारत का नक्शा, संविधान और एकता का प्रतीक समूह — आशा और राष्ट्रीय आत्मचिंतन”

“स्मृति, जिम्मेदारी और भविष्य: क्या हमने इतिहास से सीखा?”

इतिहास केवल याद रखने के लिए नहीं, समझने के लिए होता है

“स्मृति से समाधान तक: यह श्रृंखला क्यों?”

कभी-कभी इतिहास केवल बीतता नहीं ....
वह हमारे भीतर ठहर जाता है।
वह पीढ़ियों की स्मृतियों में, घरों की दीवारों में, और राष्ट्र की सामूहिक चेतना में एक अनकहा प्रश्न बनकर जीवित रहता है।

भारत जैसे विविध और जटिल समाज में, पिछले कुछ दशकों की कई घटनाओं ने हमें भीतर तक झकझोरा है।
कुछ घटनाएँ समय के साथ धुँधली पड़ गईं,
कुछ आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं,
और कुछ ऐसे घाव हैं जो दिखाई भले न दें, पर पूरी तरह भरे भी नहीं।

ऐसी स्मृतियाँ केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं माँगतीं ,
वे राष्ट्रीय आत्मचिंतन की माँग करती हैं।

यह लेख-श्रृंखला किसी भी जाति, धर्म, क्षेत्र, समुदाय या राजनीतिक नेतृत्व के प्रति विरोध, दुर्भावना या आरोप उत्पन्न करने के लिए नहीं लिखी जा रही है।
न ही यह किसी एक दृष्टिकोण को अंतिम सत्य घोषित करने का प्रयास है।

यह प्रयास है
एक राष्ट्र के रूप में स्वयं से प्रश्न करने का।
यह समझने का कि हमने क्या देखा, क्या सीखा, और क्या अभी भी सीखना बाकी है।

हम क्या समझना चाहते हैं?

क्या इन घटनाओं के पीछे केवल भावनाएँ थीं, या संरचनात्मक कमियाँ भी थीं?

क्या प्रशासनिक तैयारी, कानून व्यवस्था और संस्थागत जवाबदेही पर्याप्त थी?

क्या मीडिया और नागरिक समाज ने अपनी भूमिका संतुलन और जिम्मेदारी के साथ निभाई?

क्या हम हर बार शोक मनाकर आगे बढ़ जाते हैं ,
या हम सुधार की दिशा में ठोस कदम भी उठाते हैं?

और सबसे महत्वपूर्ण
क्या हम इतिहास से सचमुच सीखते हैं?

यह श्रृंखला किसके विरुद्ध नहीं है

यह किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है।
यह किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं है।
यह किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं है।
यह अतीत को भड़काने या विभाजन पैदा करने के लिए नहीं है।

बल्कि यह इस विश्वास पर आधारित है कि
राष्ट्र की मजबूती आत्मचिंतन से आती है, आरोपों से नहीं।

लोकतंत्र में सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी होती है।
और नागरिक के रूप में हमारी भूमिका केवल दर्शक की नहीं, सहभागी की है।

हमारा मूल उद्देश्य

सामाजिक सद्भाव को सर्वोच्च प्राथमिकता देना

संविधान और विधि-राज को चर्चा के केंद्र में रखना

तथ्य आधारित, संतुलित और जिम्मेदार विश्लेषण प्रस्तुत करना

समाधान-केंद्रित संवाद को बढ़ावा देना

हम यह जानना चाहते हैं कि:

ऐसी घटनाएँ क्यों घटती हैं?
किस स्तर पर तंत्र कमजोर पड़ता है?
कहाँ संवाद टूटता है?
और नागरिक के रूप में हम क्या बदल सकते हैं?

क्यों अभी?

क्योंकि स्मृति केवल पीड़ा नहीं होती ,
वह चेतावनी भी होती है।

क्योंकि इतिहास का उद्देश्य बदला नहीं,
बेहतर और अधिक जिम्मेदार भविष्य का निर्माण होना चाहिए।

क्योंकि यदि हम प्रश्न नहीं पूछेंगे,
तो उत्तर कभी सामने नहीं आएँगे।

और क्योंकि सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता केवल भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकता से मजबूत होती है।

पाठकों से निवेदन

यह श्रृंखला संवाद के लिए है, विवाद के लिए नहीं।
आप असहमत हो सकते हैं — और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है।
लेकिन आइए असहमति को भी गरिमा, तथ्य और संवैधानिक मर्यादा के साथ रखें।

यदि किसी भी भाग में अनजाने में त्रुटि हो, तो रचनात्मक सुझावों का स्वागत है।

हमारा लक्ष्य है —
स्मृति को समाधान में बदलना।
आत्मचिंतन को आत्मबल में परिवर्तित करना।

रोहित थपलियाल
संस्थापक एवं संपादक
DeshDharti360