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असम और मणिपुर: पहचान, नागरिकता और प्रशासनिक संतुलन

असम और मणिपुर के संदर्भ में पहचान, NRC, जातीय संघर्ष और प्रशासनिक जवाबदेही का संतुलित विश्लेषण।

राष्ट्र-चिंतनविश्लेषण

रोहित थपलियाल

2/12/2026

“पूर्वोत्तर भारत का पहाड़ी परिदृश्य — पहचान और सामाजिक संतुलन के विमर्श का प्रतीक”
“पूर्वोत्तर भारत का पहाड़ी परिदृश्य — पहचान और सामाजिक संतुलन के विमर्श का प्रतीक”

भारत की विविधता उसकी शक्ति है।
लेकिन जब पहचान, संसाधन और प्रशासनिक संतुलन के प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं,
तो वही विविधता तनाव का कारण बन सकती है।

असम और मणिपुर — पूर्वोत्तर भारत के दो राज्य ,
हमें यही जटिलता समझने का अवसर देते हैं।

यह केवल क्षेत्रीय घटनाएँ नहीं हैं।
यह पहचान, नागरिकता, भूमि अधिकार और शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा हैं।

असम: पहचान और जनसंख्या का प्रश्न

असम में दशकों से एक चिंता मौजूद रही ,
स्थानीय पहचान और जनसंख्या परिवर्तन को लेकर।

1979–1985 के बीच चला असम आंदोलन
इन्हीं चिंताओं की अभिव्यक्ति था।

इसी पृष्ठभूमि में 1983 की एक भयावह घटना सामने आई ,
Nellie massacre नेल्ली नरसंहार

इस हिंसा में बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की जान गई।
यह केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं था ,
यह विश्वास का संकट था।

NRC और नागरिकता का विमर्श

बाद के वर्षों में National Register of Citizens (NRC)
एक प्रशासनिक समाधान के रूप में सामने आया।

इसका उद्देश्य नागरिकता का वैधानिक निर्धारण था।
लेकिन इस प्रक्रिया ने कई प्रश्न उठाए:

क्या प्रक्रिया पारदर्शी और सुलभ थी?

क्या दस्तावेज़ी जटिलताओं को समझने में नागरिकों की सहायता हुई?

क्या भय और अनिश्चितता कम हुई या बढ़ी?

लोकतंत्र में प्रशासनिक समाधान
संवेदनशीलता और संवाद के बिना सफल नहीं होते।

स्थानीय बनाम बाहरी: मनोवैज्ञानिक आयाम

जब संसाधन सीमित हों और जनसंख्या दबाव बढ़े,
तो “स्थानीय” और “बाहरी” का विमर्श उभरना स्वाभाविक है।

लेकिन लोकतंत्र में समाधान पहचान को नकारना नहीं,
बल्कि उसे संवैधानिक ढाँचे में संतुलित करना है।

यदि कोई समुदाय यह महसूस करे कि
उसकी पहचान खतरे में है ,
तो संवाद आवश्यक हो जाता है।

यदि कोई नागरिक यह महसूस करे कि
उसकी नागरिकता संदिग्ध है ,
तो विधिक प्रक्रिया और भी पारदर्शी होनी चाहिए।

मणिपुर: जातीय संतुलन और प्रशासनिक चुनौती

हाल के वर्षों में मणिपुर में


मेइतेई

और

कुकी


समुदायों के बीच गंभीर हिंसक संघर्ष हुआ।

यह संघर्ष केवल सामुदायिक तनाव नहीं था।
इसके पीछे जटिल कारण थे:

भूमि और पहाड़ी क्षेत्रों पर अधिकार

आरक्षण और कानूनी स्थिति

जनसांख्यिकीय संरचना

सीमाई असुरक्षा

प्रशासनिक प्रतिक्रिया पर प्रश्न

हर बड़े संकट की तरह यहाँ भी कुछ प्रश्न उठे:

क्या प्रारंभिक संकेतों को गंभीरता से लिया गया?

क्या कानून-व्यवस्था पर्याप्त रूप से सक्रिय थी

क्या संवाद तंत्र समय पर स्थापित हुआ?

क्या राजनीतिक नेतृत्व की भाषा संतुलित और शांति-उन्मुख थी?

यहाँ उद्देश्य दोष तय करना नहीं है।
उद्देश्य है


संस्थागत आत्ममूल्यांकन।

राजनीति और शब्दों की जिम्मेदारी

संकट की घड़ी में शब्द भी शांति ला सकते हैं,
और शब्द ही तनाव बढ़ा सकते हैं।

उच्च पदों पर बैठे नेताओं की जिम्मेदारी है कि:

वे संतुलित भाषा का प्रयोग करें

सभी पीड़ितों के प्रति समान संवेदना दिखाएँ

और समाधान-मुखी संवाद को प्राथमिकता दें

राजनीतिक बयानबाज़ी यदि असंतुलित हो,
तो समाज में अविश्वास गहरा सकता है।

क्या एक साझा पैटर्न है?

असम, मणिपुर, 1984 और 1990
इन सभी घटनाओं में संदर्भ अलग हैं।

लेकिन कुछ प्रश्न समान हैं:

क्या प्रारंभिक चेतावनियों को अनदेखा किया गया?

क्या संस्थागत तैयारी पर्याप्त थी?

क्या संवाद समय पर हुआ?

क्या न्यायिक प्रक्रिया ने विश्वास पुनर्स्थापित किया?

यहीं से यह समझना आवश्यक हो जाता है कि
भारत में सामुदायिक संघर्ष का पैटर्न क्या है।

राष्ट्रीय एकता का व्यापक आयाम

पूर्वोत्तर भारत हमें यह सिखाता है कि:

✔ पहचान का सम्मान आवश्यक है
✔ संसाधनों का संतुलन आवश्यक है
✔ प्रशासनिक निष्पक्षता अनिवार्य है
✔ और नागरिक संवाद सर्वोपरि है

राष्ट्र की एकता केवल भावनात्मक नारे से नहीं,
संतुलित नीतियों और जिम्मेदार नागरिकता से बनती है।

आगे की दिशा

अगले भाग में हम यह विश्लेषण करेंगे कि
क्या ये घटनाएँ केवल अलग-अलग राज्यों की कहानियाँ हैं
या इनके पीछे कोई साझा संरचनात्मक पैटर्न मौजूद है।

— रोहित थपलियाल
संस्थापक एवं संपादक
DeshDharti360