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प्रशासन और न्याय व्यवस्था: जवाबदेही क्यों धीमी पड़ती है?
सामुदायिक संकटों में प्रशासनिक प्रतिक्रिया, न्यायिक विलंब और जवाबदेही की संरचनात्मक जटिलताओं का संतुलित विश्लेषण। प्रशासनिक जवाबदेही भारत
राष्ट्र-चिंतनविश्लेषण
रोहित थपलियाल
2/12/2026
किसी भी सामुदायिक तनाव या हिंसक घटना के बाद समाज का पहला प्रश्न यही होता है ,
जवाबदेही कहाँ है?
कौन जिम्मेदार था?
प्रशासन ने क्या किया?
न्याय कब मिलेगा?
लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर तुरंत नहीं आते।
और जब उत्तर देर से आते हैं,
तो पीड़ा और गहरी हो जाती है।
यह अध्याय किसी संस्था पर आरोप लगाने के लिए नहीं है।
यह समझने के लिए है कि जवाबदेही की प्रक्रिया धीमी क्यों पड़ जाती है ,
और उसे कैसे सुधारा जा सकता है।
1️⃣ प्रशासनिक संरचना की जटिलता
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था बहु-स्तरीय है:
स्थानीय थाना और पुलिस
जिला प्रशासन
राज्य गृह विभाग
कभी-कभी केंद्रीय बल
संकट के समय इन सभी के बीच त्वरित समन्वय आवश्यक होता है।
उदाहरण के लिए, विभिन्न राज्यों में हुई सामुदायिक घटनाओं में अक्सर यह प्रश्न उठता रहा है कि प्रारंभिक घंटों में बल की पर्याप्त तैनाती क्यों नहीं हो सकी। कई बार कारण यह पाया गया कि:
बल उपलब्ध था, पर आदेश में विलंब हुआ
आदेश था, पर ज़मीनी संचार बाधित था
या सूचना की पुष्टि में समय लगा
यह दिखाता है कि समस्या हमेशा “इच्छा” की नहीं,
कभी-कभी “संरचना और समन्वय” की भी होती है।
सुधार दिशा:
एक स्पष्ट संकट-श्रृंखला (Crisis Chain of Command) आवश्यक है,
जहाँ प्रत्येक स्तर की भूमिका पूर्व-निर्धारित हो।
2️⃣ प्रारंभिक 24–48 घंटे: निर्णायक समय
कई अध्ययनों में पाया गया है कि सामुदायिक तनाव की स्थिति में शुरुआती 24–48 घंटे निर्णायक होते हैं।
यदि:
त्वरित कर्फ्यू लागू हो
स्पष्ट आधिकारिक सूचना जारी हो
अफवाहों का तुरंत खंडन हो
पर्याप्त बल दिखाई दे
तो स्थिति नियंत्रण में आ सकती है।
लेकिन यदि प्रारंभिक प्रतिक्रिया धीमी या अस्पष्ट लगे,
तो समाज में यह संदेश जाता है कि “स्थिति अनियंत्रित है”।
उदाहरण के रूप में, विभिन्न राज्यों में हुई हिंसात्मक घटनाओं के बाद मीडिया विश्लेषण में
अक्सर यह चर्चा हुई कि सूचना स्पष्ट रूप से और शीघ्र क्यों नहीं दी गई।
सुधार दिशा:
जिला-स्तरीय त्वरित प्रतिक्रिया दल
आधिकारिक डिजिटल अपडेट पोर्टल
संकट-संचार प्रशिक्षण
3️⃣ जाँच आयोग और न्यायिक प्रक्रिया की लंबाई
कई बड़ी घटनाओं के बाद जाँच आयोग गठित किए गए।
रिपोर्ट तैयार हुईं।
कई मामलों में दोष सिद्ध भी हुए।
लेकिन यह प्रक्रिया वर्षों तक चली।
न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण:
साक्ष्य संकलन में समय
गवाहों की सुरक्षा की चुनौती
कानूनी अपील की बहु-स्तरीय व्यवस्था
शामिल होते हैं।
उदाहरणस्वरूप, अतीत की कई प्रमुख घटनाओं में अंतिम निर्णय आने में लंबा समय लगा,
जिससे पीड़ित परिवारों में यह भावना उत्पन्न हुई कि न्याय बहुत देर से मिला।
यहाँ प्रश्न न्यायपालिका की मंशा का नहीं —
प्रक्रिया की जटिलता का है।
सुधार दिशा:
सामुदायिक हिंसा मामलों के लिए समय-सीमा आधारित फास्ट-ट्रैक न्यायालय
गवाह संरक्षण तंत्र का सुदृढ़ीकरण
पारदर्शी प्रगति रिपोर्टिंग
4️⃣ राजनीतिक और प्रशासनिक दूरी
कभी-कभी निर्णय-स्तर और ज़मीनी स्तर के बीच दूरी समस्या बन जाती है।
नीति-निर्माण राजधानी में होता है,
लेकिन कार्यान्वयन ज़मीन पर।
यदि ज़मीनी अधिकारियों को पर्याप्त विवेक और त्वरित निर्णय का अधिकार न हो,
तो प्रतिक्रिया धीमी हो सकती है।
कुछ घटनाओं के बाद विश्लेषण में यह सामने आया कि स्थानीय प्रशासन को स्पष्ट निर्देश मिलने में समय लगा।
सुधार दिशा:
विकेंद्रीकृत निर्णय-शक्ति
स्थानीय जोखिम मूल्यांकन प्रणाली
नियमित संकट-अभ्यास (mock drills)
5️⃣ पुनर्वास: न्याय का मानवीय आयाम
किसी भी संघर्ष के बाद केवल दोष तय करना पर्याप्त नहीं होता।
न्याय का दूसरा आयाम है — पुनर्वास।
घरों की पुनर्निर्माण सहायता
आर्थिक पुनर्स्थापन
मनोवैज्ञानिक परामर्श
शिक्षा और आजीविका समर्थन
यदि पुनर्वास में देरी हो,
तो पीड़ा स्मृति में स्थायी हो जाती है।
अतीत की कई घटनाओं में यह देखा गया कि आर्थिक मुआवजा तो घोषित हुआ,
लेकिन वितरण में विलंब हुआ या प्रक्रिया जटिल रही।
सुधार दिशा:
डिजिटल मुआवजा ट्रैकिंग प्रणाली
पुनर्वास की स्वतंत्र निगरानी समिति
सामुदायिक परामर्श केंद्र
6️⃣ जवाबदेही का नैतिक आयाम
कानूनी जवाबदेही आवश्यक है।
लेकिन नैतिक जवाबदेही उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
यदि प्रशासन पारदर्शी हो,
यदि राजनीतिक नेतृत्व संयमित हो,
यदि न्याय प्रणाली समयबद्ध हो —
तो समाज में यह संदेश जाता है कि
राज्य जागरूक और जिम्मेदार है।
लोकतंत्र केवल प्रक्रिया से नहीं,
विश्वास से चलता है।
निष्कर्ष
जवाबदेही धीमी इसलिए नहीं पड़ती कि संस्थाएँ स्वभावतः निष्क्रिय हैं।
अक्सर वह प्रक्रिया की जटिलता, संसाधनों की सीमाएँ,
और समन्वय की चुनौतियों के कारण धीमी पड़ती है।
लेकिन सुधार संभव है।
यदि:
संकट-प्रबंधन संरचना स्पष्ट हो
न्याय समयबद्ध हो
पुनर्वास संवेदनशील हो
और संचार पारदर्शी हो
तो जवाबदेही तेज़ और विश्वसनीय बन सकती है।
और जब जवाबदेही विश्वसनीय होती है —
तो समाज का विश्वास मजबूत होता है।
— रोहित थपलियाल
संस्थापक एवं संपादक
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